आज बस में यात्रा करते समय
एक छोटी सी घटना घटी जो अजीबो गरीब
थी....एक मौलबी साहब हमरे बगल के सिट पर बैठे थे और हमें अपनी पत्नी से बात करते
समय ध्यान से सुन रहे थे जब मैने फोन कट किया तो तपाक से बोले, मिया आप मुस्लमान
हो! ....हमे उनके इस प्रश्न पर हंसी आ गई और हंसते हुए कहा, नहीं जनब हिन्दू ! वो थोड़ी देर मौन रहे और बस भी हिचकोले खाते हुए
एक अच्छी सड़क के साईड आ गई और आरम से बस आगे बढ़ने लगी…..कुछ देर बाद बस एक
मंदिर के पास से गुजरा और हमनें मंदिर को देखकर सिर झुकाया तो उन्होनें बोला, मिया आप की ज़बान और आपकी हुलिया आपको मुस्लमान साबित करती है....लेकिन जब
आप ने बुत परस्ति के लिये सिर झुकाया तो जहनी तौर से एहसास हो गया की आप हिन्दू
हैं......अब की बार हमारे हंसी का ठिकाना नहीं था और बस के सभी लोगो को हमारी हंसी ने अपनी ओर खींच ली....फिर हंसते हुए हमने कहा....यह पहली बार नही हुआ हमारे साथ, कभी
हमारे लड़कपन में कुछ लवन्डो की टोली ने घर आकर कहा भाई जान कभी कभार नवाज़ के
लिये आ जाया करिये रोज न सही ज़ुम्मे के दिन ही आ जाया करिये......इतना कहने के
बाद हमने अपने माथे पर शिकन देखा और उनसे कहा, “साहब यह हो सकता है कि, ब्यवहार में हिन्दू हूँ
लेकिन ईमान से मुस्सलमान” ....और इतनी सी बात कह कर अपने माथे की शिकन को लेकर अपने
मंजिल तक पहुंच गया.....और पूरे रास्ते सोचता रहा काश बनाने वाले ने यह जन्म एक
मुस्लमान के घर दिया होता......... कम से कम इमान वोलों के बीच में रहता....
@जीव
!!! तफशीश करना हमारे इमान का
क्योकि ख़ुदा वाले हैं हम !!!
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